Monday, December 16, 2013

रिवाज- ए- दुनिया...


जरा हौसला कर मैंने, 
जो कदम निकाला डेहरी  पर 
मेरे हिस्से की जमीं ही,
  मुझसे मुँह मोड़ लेती है|  

मै सोचती हु बेख़ौफ़ हो 
कही दूर उड़ जाउ एक दिन 
पर चिढ़कर किस्मत
मेरे ही पंखों को नोच देती है। 
 
मालूम नही मुझे के कैंसे, 
पहुँचू  मै अंजाम तलक 
जिन राहो को छोड़ती हूँ ,
दिशायें फिर वही मोड़ देती है। 
 
मुझे वो आसमान का
 नीला टुकड़ा भी नही दिखता 
रिवाज- ए- दुनिया मुझे  
चारदीवारी में समेट  देती है । प्रीती